Chapter 3 · Verse 38
Reference BG3.38
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च | यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ||३-३८||
dhūmenāvriyate vahniryathādarśo malena ca . yatholbenāvṛto garbhastathā tenedamāvṛtam ||3-38||
As fire is enveloped by smoke, as a mirror by dust, and as an embryo by the amnion, so is this enveloped by that.
।।3.38।। जैसे धुयें से अग्नि और धूलि से दर्पण ढक जाता है तथा जैसे भ्रूण गर्भाशय से ढका रहता है, वैसे उस (काम) के द्वारा यह (ज्ञान) आवृत होता है।।
Translations & commentaries
Explore the available interpretations preserved in the source data.
A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada
English Translation
+
A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada
English Translation
Listen to this english translation
As fire is covered by smoke, as a mirror is covered by dust, or as the embryo is covered by the womb, the living entity is similarly covered by different degrees of this lust.
Dr.S.Sankaranarayan
English Translation
+
Dr.S.Sankaranarayan
English Translation
Listen to this english translation
As the fire is concealed by smoke and a mirror by dirt, and as the embryo is concealed by membrance-cover, so He is concealed by this (foe).
Shri Purohit Swami
English Translation
+
Shri Purohit Swami
English Translation
Listen to this english translation
As fire is shrouded in smoke, a mirror by dust and a child by the womb, so is the universe enveloped in desire.
Sri Abhinav Gupta
English Translation
+
Sri Abhinav Gupta
English Translation
Listen to this english translation
Dhumena etc. [The foe's tripple nature viz.] being a mischivous appendage, himself creating mischieves, and being an object of disgust, is explained by the triad of these similes. He : the Self.
Sri Ramanuja
English Translation
+
Sri Ramanuja
English Translation
Listen to this english translation
As a fire is enveloped by smoke, as a mirror by dust and as an embryo by the membrance, so are the embodied beings covered by this desire. Sri Krsna teaches the mode of this envelopement:
Sri Shankaracharya
English Translation
+
Sri Shankaracharya
English Translation
Listen to this english translation
Yatha, as; vahnih, fire, which is naturally bright; avriyate, is enveloped; dhumena, by smoke, which is born concomitantly (with fire) and is naturally dark; or as adarsah, a mirror; is covered malena, by dirt; ca, and; garbhah, a foetus; is avrtah, enclosed; ulbena, in the womb by the amnion; tatha, so; is idam, this; avrtam, shrouded; tena, by that. Again, what is that which is indicated by the word idam (this), and which is covered by desire? The answer is:
Swami Adidevananda
English Translation
+
Swami Adidevananda
English Translation
Listen to this english translation
As a fire is enveloped by smoke, as a mirror is covered by dust, and as an embryo is encased in the membrane, so is this (worldA) enveloped by it (desire).
Swami Gambirananda
English Translation
+
Swami Gambirananda
English Translation
Listen to this english translation
As fire is enveloped by smoke, as a mirror by dirt, and as a foetus remains enclosed in the womb, so in this shrouded by that.
Swami Sivananda
English Translation
+
Swami Sivananda
English Translation
Listen to this english translation
As fire is enveloped by smoke, as a mirror by dust, and as an embryo by the amnion, so is this enveloped by that.
A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada
English Commentary
+
A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada
English Commentary
Listen to this english commentary
There are three degrees of covering of the living entity by which his pure consciousness is obscured. This covering is but lust under different manifestations like smoke in the fire, dust on the mirror, and the womb about the embryo. When lust is compared to smoke, it is understood that the fire of the living spark can be a little perceived. In other words, when the living entity exhibits his Kṛṣṇa consciousness slightly, he may be likened to the fire covered by smoke. Although fire is necessary where there is smoke, there is no overt manifestation of fire in the early stage. This stage is like the beginning of Kṛṣṇa consciousness. The dust on the mirror refers to a cleansing process of the mirror of the mind by so many spiritual methods. The best process is to chant the holy names of the Lord. The embryo covered by the womb is an analogy illustrating a helpless position, for the child in the womb is so helpless that he cannot even move. This stage of living condition can be compared to that of the trees. The trees are also living entities, but they have been put in such a condition of life by such a great exhibition of lust that they are almost void of all consciousness. The covered mirror is compared to the birds and beasts, and the smoke-covered fire is compared to the human being. In the form of a human being, the living entity may revive a little Kṛṣṇa consciousness, and, if he makes further development, the fire of spiritual life can be kindled in the human form of life. By careful handling of the smoke in the fire, fire can be made to blaze. Therefore the human form of life is a chance for the living entity to escape the entanglement of material existence. In the human form of life, one can conquer the enemy, lust, by cultivation of Kṛṣṇa consciousness under able guidance.
Swami Sivananda
English Commentary
+
Swami Sivananda
English Commentary
Listen to this english commentary
धूमेन by smoke? आव्रियते is enveloped? वह्निः fire? यथा as? आदर्शः a mirror? मलेन by dust? च and? यथा as? उल्बेन by the amnion? आवृतः enveloped? गर्भः embryo? तथा so? तेन by it? इदम् this? आवृतम् enveloped.Commentary This means the universe. This also means knowledge. That means desire.
Sri Shankaracharya
Hindi Translation
+
Sri Shankaracharya
Hindi Translation
Listen to this hindi translation
।।3.38।।यह काम किस प्रकार वैरी है सो दृष्टान्तोंसे समझाते हैं जैसे प्रकाशस्वरूप अग्नि अपने साथ उत्पन्न हुए अन्धकाररूप धूएँसे और दर्पण जैसे मलसे आच्छादित हो जाता है तथा जैसे गर्भ अपने आवरणरूप जेरसे आच्छादित होता है वैसे ही उस कामसे यह ( ज्ञान ) ढका हुआ है।
Swami Ramsukhdas
Hindi Translation
+
Swami Ramsukhdas
Hindi Translation
Listen to this hindi translation
।।3.38।। जैसे धुएँसे अग्नि और मैलसे दर्पण ढक जाता है तथा जैसे जेरसे गर्भ ढका रहता है, ऐसे ही उस कामके द्वारा यह ज्ञान ( विवेक) ढका हुआ है।
Swami Tejomayananda
Hindi Translation
+
Swami Tejomayananda
Hindi Translation
Listen to this hindi translation
।।3.38।। जैसे धुयें से अग्नि और धूलि से दर्पण ढक जाता है तथा जैसे भ्रूण गर्भाशय से ढका रहता है, वैसे उस (काम) के द्वारा यह (ज्ञान) आवृत होता है।।
Swami Chinmayananda
Hindi Commentary
+
Swami Chinmayananda
Hindi Commentary
Listen to this hindi commentary
।।3.38।। यहाँ तीन दृष्टान्त यह समझाने के लिये दिये गये हैं कि किस प्रकार काम और क्रोध हमारे विचार की सार्मथ्य को आवृत कर देते हैं। शास्त्रों में इसे पुनरुक्ति दोष माना गया है। किन्तु गीता में यह दोष नहीं मिलता। भगवद्गीता में कहीं पर भी अनावश्यक या निरर्थक पुनरुक्ति नहीं है। इसे ध्यान में रखकर इस श्लोक को समझने का प्रयत्न करें तो ज्ञात होगा कि यहाँ दिये तीनों दृष्टान्तों में सूक्ष्म भेद है। वाच्यार्थ से कहीं अधिक अर्थ इस श्लोक में बताया गया है।जगत् की अनित्य वस्तुओं के साथ आसक्ति के कारण मनुष्य की विवेचन सार्मथ्य आच्छादित हो जाती है। हमारी आसक्तियाँ अथवा इच्छाएँ तीन भागों में विभाजित की जा सकती हैं। अत्यन्त निम्न स्तर की इच्छाएँ मुख्यत शारीरिक उपभोगों के लिये दूसरे हमारी महत्त्वाकांक्षाएँ हो सकती हैं सत्ता धन प्रसिद्धि और कीर्ति पाने के लिये। इनसे भिन्न तीसरी इच्छा हो सकती है आत्मविकास और आत्मसाक्षात्कार की। ये तीन प्रकार की इच्छाएँ गुणों के प्राधान्य से क्रमश तामसिक राजसिक और सात्त्विक कहलाती हैं। तीन दृष्टान्तों के द्वारा इन तीन प्रकार की इच्छाओं से उत्पन्न विभिन्न प्रकार के आवरणों को स्पष्ट किया गया है।जैसे धुयें से अग्नि अनेक बार धुयें से अग्नि की चमकती ज्वाला पूर्णत या अंशत आवृत हो जाती है। इसी प्रकार सात्त्विक इच्छाएँ भी अनन्त स्वरूप आत्मा के प्रकाश को आवृत सी कर लेती हैं।जैसे धूलि से दर्पण रजोगुण से उत्पन्न विक्षेपों के कारण बुद्धि पर पड़े आवरण को इस उदाहरण के द्वारा स्पष्ट किया गया है। धुएँ के आवरण की अपेक्षा दर्पण पर पड़े धूलि को दूर करने के लिये अधिक प्रयत्न की आवश्यकता होती है। बहते हुये वायु के एक हल्के से झोंके से ही धुआँ हट जाता है जबकि तूफान के द्वारा भी दर्पण स्वच्छ नहीं किया जा सकता। केवल एक स्वच्छ सूखे कपड़े से पोंछकर ही उसे स्वच्छ करना सम्भव है। धुँए के होने पर भी कुछ मात्रा में अग्नि दिखाई पड़ती है परन्तु धूलि की मोटी परत जमी हुई होने पर दर्पण में प्रतिबिम्ब बिल्कुल नहीं दिखाई पड़ता।जैसे गर्भाशय से भ्रूण तमोगुण जनित अत्यन्त निम्न पशु जैसी वैषयिक कामनाएँ दिव्य स्वरूप को पूर्णत आवृत कर देती हैं जिसे समझने के लिए यह भ्रूण का दृष्टांत दिया गया है। गर्भस्थ शिशु पूरी तरह आच्छादित रहता है और उसके जन्म के पूर्व उसे देखना संभव भी नहीं होता। यहाँ आवरण पूर्ण है और उसके दूर होने के लिये कुछ निश्चित काल की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार तामसिक इच्छाओं से उत्पन्न बुद्धि पर के आवरण को हटाने के लिए जीव को विकास की सीढ़ी पर चढ़ते हुए दीर्घकाल तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है।इस प्रकार इन भिन्नभिन्न प्रकार की इच्छाओं से उत्पन्न विभिन्न तारतम्य में अनुभव में आने वाले आवरणों को स्पष्ट किया गया है।इस श्लोक में केवल सर्वनामों का उपयोग करके कहा गया है कि उसके द्वारा यह आवृत है। अब अगले श्लोक में इन दोनों सर्वनामों उसके द्वारा और यह को स्पष्ट किया गया है
Swami Ramsukhdas
Hindi Commentary
+
Swami Ramsukhdas
Hindi Commentary
Listen to this hindi commentary
।।3.38।। व्याख्या--'धूमेनाव्रियते वह्निः'-- जैसे धुएँसे अग्नि ढकी रहती है, ऐसे ही कामनासे मनुष्यका विवेक ढका रहता है अर्थात् स्पष्ट प्रतीत नहीं होता। विवेक बुद्धिमें प्रकट होता है। बुद्धि तीन प्रकारकी होती है--सात्त्विकी, राजसी और तामसी। सात्त्विकी बुद्धिमें कर्तव्य-अकर्तव्य ठीक-ठीक ज्ञान होता है, राजसी बुद्धिमें कर्तव्य-अकर्तव्यका ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता और तामसी बुद्धिमें सब वस्तुओंका विपरीत ज्ञान होता है (गीता 18। 30 32)। कामना उत्पन्न होनेपर सात्त्विकी बुद्धि भी धुएँसे अग्निके समान ढकी जाती है, फिर राजसी और तामसी बुद्धिका तो कहना ही क्या है ! सांसारिक इच्छा उत्पन्न होते ही पारमार्थिक मार्गमें धुआँ हो जाता है। अगर इस अवस्थामें सावधानी नहीं हुई तो कामना और अधिक बढ़ जाती है। कामना बढ़नेपर तो पारमार्थिक मार्गमें अँधेरा ही हो जाता है।उत्पत्ति विनाशशील जड वस्तुओंमें प्रियता, महत्ता, सुखरूपता, सुन्दरता, विशेषता आदि दीखनेके कारण ही उनकी कामना पैदा होती है। यह कामना ही मूलमें विवेकको ढकनेवाली है। अन्य शरीरोंकी अपेक्षा मनुष्य-शरीरमें विवेक विशेषरूपसे प्रकट है; किन्तु जड पदार्थोंकी कामनाके कारण वह विवेक काम नहीं करता। कामना उत्पन्न होते ही विवेक धुँधला हो जाता है। जैसे धुँएसे ढकी रहनेपर भी अग्नि काम कर सकती है, ऐसे ही यदि साधक कामनाके पैदा होते ही सावधान हो जाय तो उसका विवेक काम कर सकता है।प्रथमावस्थामें ही कामनाको नष्ट करनेका सरल उपाय यह है कि कामना उत्पन्न होते ही साधक विचार करे कि हम जिस वस्तुकी कामना करते हैं, वह वस्तु हमारे साथ सदा रहनेवाली नहीं है। वह वस्तु पहले भी हमारे साथ नहीं थी और बादमें भी हमारे साथ नहीं रहेगी तथा बीचमें भी उस वस्तुका हमारेसे निरन्तर वियोग हो रहा है। ऐसा विचार करनेसे कामना नहीं रहती।'यथादर्शो मलेन च'-- जैसे मैलसे ढक जानेपर दर्पणमें प्रतिबिम्ब दीखना बंद हो जाता है, ऐसे ही कामनाका वेग बढ़नेपर 'मैं साधक हूँ; मेरा यह कर्तव्य और यह अकर्तव्य है'-- इसका ज्ञान नहीं रहता। अन्तःकरणमें नाशवान् वस्तुओंका महत्त्व ज्यादा हो जानेसे मनुष्य उन्हीं वस्तुओंके भोग और संग्रहकी कामना करने लगता है। यह कामना ज्यों-ज्यों बढ़ती है त्यों-ही-त्यों मनुष्यका पतन होता है।वास्तवमें महत्त्व वस्तुका नहीं, प्रत्युत उसके उपयोगका होता है। रुपये, विद्या, बल आदि स्वयं कोई महत्त्वकी वस्तुएँ नहीं हैं, उनका सदुपयोग ही महत्त्वका है--यह बात समझमें आ जानेपर फिर उनकी कामना नहीं रहती; क्योंकि जितनी वस्तुएँ हमारे पासमें हैं, उन्हींके सदुपयोगकी हमारेपर जिम्मेवारी है। उन वस्तुओंको भी सदुपयोगमें लगाना है, फिर अधिककी कामनासे क्या होगा? कारण कि कामना-मात्रसे वस्तुएँ प्राप्त नहींहोतीं।सांसारिक वस्तुओंका महत्त्व ज्यों-ज्यों कम होगा, त्यों-ही-त्यों परमात्माका महत्त्व साधकके अन्तःकरणमें बढ़ेगा। सांसारिक वस्तुओंका महत्त्व सर्वथा नष्ट होनेपर परमात्माका अनुभव हो जायगा और कामना सर्वथा नष्ट हो जायगी।यथोल्बेनावृतो गर्भः-- दर्पणपर मैल आनेसे उसमें अपना मुख तो नहीं दीखता, पर 'यह दर्पण है' ऐसा ज्ञान तो रहता ही है। परन्तु जैसे जेरसे ढके गर्भका यह पता नहीं लगता कि लड़का है या लड़की, ऐसे ही कामनाकी तृतीयावस्थामें कर्तव्य-अकर्तव्यका पता नहीं लगता अर्थात् विवेक पूरी तरह ढक जाता है। विवेक ढक जानेसे कामनाका वेग बढ़ जाता है। कामनामें बाधा लगनेसे क्रोध उत्पन्न होता है। फिर उससे सम्मोह उत्पन्न होता है। सम्मोहसे बुद्धि नष्ट हो जाती है। बुद्धि नष्ट हो जानेपर मनुष्य करनेयोग्य कार्य नहीं करता और झूठ, कपट, बेईमानी, अन्याय, पाप, अत्याचार आदि न करनेयोग्य कार्य करने लग जाता है। ऐसे लोगोंको भगवान् 'मनुष्य' भी नहीं कहना चाहते। इसीलिये सोलहवें अध्यायमें जहाँ ऐसे लोगोंका वर्णन हुआ है, वहाँ भगवान्ने (आठवेंसे अठारहवें श्लोकतक) मनुष्यवाचक कोई शब्द नहीं दिया। स्वर्गलोगकी कामनावाले लोगोंको भी भगवान् ने कामात्मानः (गीता 2। 43) कहा है; क्योंकि ऐसे लोग कामनाके ही स्वरूप होते हैं। कामनामें ही तदाकार होनेसे उनका निश्चय होता है कि सांसारिक सुखसे बढ़कर और कुछ है ही नहीं (गीता 16। 11)।यद्यपि कामनाकी इस तृतीयावस्थामें मनुष्यकी दृष्टि अपने वास्तविक उद्देश्य (परमात्मप्राप्ति) की तरफ नहीं जाती तथापि किन्हीं पूर्वसंस्कारों से वर्तमानके किसी अच्छे सङ्गसे अथवा अन्य किसी कारणसे उसे अपने उद्देश्यकी जागृति हो जाय तो उसका कल्याण भी हो सकता है।'तथा तेनेदमावृतम्'-- इस श्लोकमें भगवान्ने एक कामके द्वारा विवेकको ढकनेके विषयमें तीन दृष्टान्त दिये हैं। अतः उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य यह है कि एक कामके द्वारा विवेक ढका जानेसे ही कामकी तीनों अवस्थाएँ प्रबुद्ध होती हैं।कामना उत्पन्न होनेपर उसकी ये तीन अवस्थाएँ सबके हृदयमें आती हैं। परन्तु जो मनुष्य कामनाको ही सुखका कारण मानकर उसका आश्रय लेते हैं और कामनाको त्याज्य नहीं मानते, वे कामनाको पहचान ही नहीं पाते। परन्तु परमार्थमें रुचि रखनेवाले तथा साधन करनेवाले पुरुष इस कामनाको पहचान लेते हैं। जो कामनाको पहचान लेता है, वही कामनाको नष्ट भी कर सकता है।भगवान्ने इस श्लोकमें कामनाकी तीन अवस्थाओंका वर्णन उसका नाश करनेके उद्देश्यसे ही किया है, जिसकी आज्ञा उन्होंने आगे इकतालीसवें और तैंतालीसवें श्लोकमें दी है। वास्तवमें कामना उत्पन्न होनेके बाद उसके बढ़नेका क्रम इतनी तेजीसे होता है कि उसकी उपर्युक्त तीन अवस्थाओंको कहनेमें तो देर लगती है, पर कामनाके बढ़नेमें कोई देर नहीं लगती। कामना बढ़नेपर तो अनर्थ-परम्परा ही चल पड़ती है। सम्पूर्ण पाप, सन्ताप, दुःख आदि कामनाके कारण ही होते हैं। अतएव मनुष्यको चाहिये कि वह अपने विवेकको जाग्रत् रखकर कामनाको उत्पन्न ही न होने दे। यदि कामना उत्पन्न हो जाय, तो भी उसे प्रथम या द्वितीय-अवस्थामें ही नष्ट कर दे। उसे तृतीयावस्थामें तो कभी आने ही न दे।विशेष बातधुँआ दिखायी देनेसे यह सिद्ध हो जाता है कि वहाँ अग्नि है; क्योंकि अगर वहाँ अग्नि न होती तो धुआँ कहाँ से आता? अतः जिस प्रकार धुएँसे ढकी होनेपर भी अग्निके होनेका ज्ञान, मैलसे ढका होनेपर भीदर्पणके होनेका ज्ञान और जेरसे ढका होनेपर भी गर्भके होनेका ज्ञान सभीमें रहता है, उसी प्रकार कामसे ढका होनेपर भी विवेक (कर्तव्य-अर्तव्यका ज्ञान) सभीमें रहता है, पर कामनाके कारण वह उपयोगमें नहीं आता।शास्त्रोंके अनुसार परमात्माकी प्राप्तिमें तीन दोष बाधक हैं-- मल, विक्षेप और आवरण। वे दोष असत् (संसार) के सम्बन्धसे उत्पन्न होते हैं। असत्का सम्बन्ध कामनासे होता है। अतः मूल दोष कामना ही है। कामनाका सर्वथा नाश होते ही असत्से सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। असत्से सम्बन्ध-विच्छेद होते ही सम्पूर्ण दोष मिट जाते हैं और विवेक प्रकट हो जाता है।परमात्मप्राप्तिमें मुख्य बाधा है-- सांसारिक पदार्थोंको नाशवान् मानते हुए उन्हें महत्त्व देना। जबतक अन्तःकरणमें नाशवान् पदार्थोंका महत्त्व है और वे सत्य, सुन्दर और सुखद प्रतीत होते हैं, तभीतक मल, विक्षेप और आवरण--ये तीनों दोष रहते हैं। इन तीनोंमें भी मनदोषको अधिक बाधक माना जाता है। मलदोष-(पाप-) का मुख्य कारण कामना ही है ;क्योंकि कामनासे ही सब पाप होते हैं। जिस समय साधक यह दृढ़ निश्चय कर लेता है कि 'मैं अब पाप नहीं करूँगा', उसी समय सब दोषोंकी जड़ कट जाती है और मलदोष मिटने लग जाता है। सर्वथा निष्काम होनेपर मलदोष सर्वथा नष्ट हो जाता है। श्रीमद्भागवतमें भगवान्ने कामनावाले पुरुषोंके कल्याणका उपाय कर्मयोग (निष्कामकर्म) बताया है--'कर्मयोगस्तु कामिनाम्' (11। 20। 7)। अतः कामनावाले पुरुषोंको अपने कल्याणके विषयमें निराश नहीं होना चाहिये; क्योंकि जिसमें कामना आयी है, वही निष्काम होगा। कर्मयोगके द्वारा कामनाओंका नाश सुगमतापूर्वक हो जाता है। छोटी-से-छोटी अथवा बड़ी-से-बड़ी प्रत्येक लौकिक या पारमार्थिक क्रिया करनेमें 'मैं क्यों करता हूँ और कैसे करता हूँ?' --ऐसी सावधानी हो जाय, तो उद्देश्यकी जागृति हो जाती है। निरन्तर उद्देश्यपर दृष्टि रहनेसे अशुभ-कर्म तो होते नहीं और शुभ-कर्मोंको भी आसक्ति तथा फलेच्छाका त्याग करके करनेपर निष्कामताका अनुभव हो जाता है और मनुष्यका कल्याण हो जाता है।
Sri Abhinav Gupta
Sanskrit Commentary
+
Sri Abhinav Gupta
Sanskrit Commentary
Listen to this sanskrit commentary
।।3.38।।धूमेनेति। दृष्टान्तत्रयेण दुरुपसर्गत्वम् (K दुरुपसर्पत्वम्) अकार्यकरत्वं जुगुप्सास्पदत्वं च उक्तम्। अयमिति आत्मा।
Sri Anandgiri
Sanskrit Commentary
+
Sri Anandgiri
Sanskrit Commentary
Listen to this sanskrit commentary
।।3.38।।उत्तरश्लोकमवतारयति कथमिति। अनेकदृष्टान्तोपादानं प्रतिपत्तिसौकर्यार्थम्। सहजस्य धूमस्य प्रकाशात्मकवह्निं प्रत्यावरकत्वसिद्ध्यर्थं विशिनष्टि अप्रकाशात्मकेनेति।
Sri Dhanpati
Sanskrit Commentary
+
Sri Dhanpati
Sanskrit Commentary
Listen to this sanskrit commentary
।।3.38।।तस्य शत्रुत्वं स्पष्टयति। यथा धूमेन सहजेनाप्रकाशात्मकेनाग्निः प्रकाशात्मको यथावाऽऽदर्शो मलेनाव्रियते यथोल्बेन गर्भवेष्टनेन जरायुणा गर्भ आच्छादितस्तथा तेन कामेनेदं ज्ञानमावृतम्। प्रथमदृष्टान्तेनात्मस्वरुपप्रकाशात्मकत्वं द्वितीयेन यथावद्विषयस्वरुपप्रतिभानात्मकत्वं तृतीयेनोहापोहात्मकत्वं ज्ञानस्यावृतिमिति बोध्यम्।
Sri Jayatritha
Sanskrit Commentary
+
Sri Jayatritha
Sanskrit Commentary
Listen to this sanskrit commentary
।।3.38।।ननु प्रश्नस्योत्तरं जातं किमुत्तरेण इत्यतः श्लोकद्वयस्य सङ्गतिमाह कथमिति। स कामः कथं मोक्षस्य विरोधी इति जिज्ञासायामाह धूमेनेत्यादिनेति शेषः। विवक्षितार्थस्यास्फुटत्वात् व्याख्याति इदमिति। ईश्वरान्तःकरणजीवलक्षणं वस्तुत्रयम्। केन किमिव इत्याकाङ्क्षायामाद्यं पादत्रयं व्याचष्टे यथेति। परमात्मा कामेनावृतः स्वयं सर्वज्ञोऽप्यन्यैर्न ज्ञायत इति शेषः। अन्यस्य मुखादेः।परमात्मादेः इत्यादिपदेन जीवो गृह्यते। बन्धापेक्षयाऽऽवरणस्य समानकर्तृकत्वम्। बद्धः सङ्कुचितो व्यापाराक्षम इति यावत्। उल्बो गर्भवेष्टनम्। कामेनावृतो जीवो नेश्वरादिज्ञाने क्षम इत्यर्थः।
Sri Madhavacharya
Sanskrit Commentary
+
Sri Madhavacharya
Sanskrit Commentary
Listen to this sanskrit commentary
।।3.38।।कथं विरोधी सः इदमनेनावृतम्। यथा धूमेनाग्निरावृतः प्रकाशरूपोऽप्यन्येषां न सम्यग्दर्शनाय तथा परमात्मा। यथाऽऽदर्शो मलेनावृतोऽन्याभिव्यक्तिहेतुर्न भवति तथाऽन्तःकरणं परमात्मादेर्व्यक्तिहेतुर्न भवति कामेनावृतम्। यथोल्बेनावृत्य बद्धो भवति गर्भः तथा कामेनावृतो जीवः।
Sri Madhusudan Saraswati
Sanskrit Commentary
+
Sri Madhusudan Saraswati
Sanskrit Commentary
Listen to this sanskrit commentary
।।3.38।।तस्य महापाप्मत्वेन वैरित्वमेव दृष्टान्तैः स्पष्टयति तत्र शरीरारम्भात्प्रागन्तःकरणस्यालब्धवृत्तिकत्वात्सूक्ष्मः कामः शरीरारम्भकेण कर्मणा स्थूलशरीरावच्छिन्ने लब्धवृत्तिकेऽन्तःकरणे कृताभिव्यक्तिः सन् स्थूलो भवति स एव विषयस्यचिन्त्यमानतावस्थायां पुनःपुनरुद्रिच्यमानः स्थूलतरो भवति स एव पुनर्विषयस्य भुज्यमानतावस्थायामत्यन्तोद्रेकं प्राप्तः स्थूलतमो भवति। तत्र प्रथमावस्थायां दृष्टान्तां यथा धूमेन सहजेनाप्रकाशात्मकेन प्रकाशात्मको वह्निराव्रियते। द्वितीयावस्थायां दृष्टान्तः यथादर्शो मलेनासहजेनादर्शोत्पत्त्यनन्तरमुद्रिक्तेन। चकारोऽवान्तरवैधर्म्यसूचनार्थः आव्रियत इति क्रियानुकर्षणार्थश्च। तृतीयावस्थायां दृष्टान्तः यथोल्बेन जरायुणा गर्भवेष्टनचर्मणातिस्थूलेन सर्वतो निरुध्यावृतः तथा प्रकारत्रयेणापि तेन कामेनेदमावृतम्। अत्र धूमेनावृतोऽपि बह्निर्दाहादिलक्षणं स्वकार्यं करोति। मलेनावृतस्त्वादर्शः प्रतिबिम्बग्रहणलक्षणं स्वकार्यं न करोति स्वच्छताधर्ममात्रतिरोधानात्। स्वरूपतस्तूपलभ्यतएव। उल्बेनावृतस्तु गर्भो न हस्तपादादिप्रसारणरूपं स्वकार्यं करोति न वा स्वरूपत उपलभ्यत इति विशेषः।
Sri Neelkanth
Sanskrit Commentary
+
Sri Neelkanth
Sanskrit Commentary
Listen to this sanskrit commentary
।।3.38।।अस्य वैरित्वमेव विवृणोति धूमेनेत्यादिना। उल्बेन गर्भवेष्टनेन जरायुणा। तेन कामेन इदं वक्ष्यमाणं ज्ञानमावृतम्। आवरणीयस्य त्रैविध्यात्तदनुगुणं दृष्टान्तत्रयं ज्ञेयम्।
Sri Purushottamji
Sanskrit Commentary
+
Sri Purushottamji
Sanskrit Commentary
Listen to this sanskrit commentary
।।3.38।।यतोऽयं वैरी ततोऽस्य ज्ञानमावर्त्तयति तेन मोहो भवतीत्याह धूमेनेति त्रयेण। यथा धूमेन वह्निराव्रियते मलेन आदर्श आब्रियते उल्बेन गर्भावेष्टनेन गर्भ आवृतः तथा तेन कामेन इदं ज्ञानमावृतम्। अत्र दृष्टान्तेषु वह्न्यादित्रयनिरूपणस्यायं भावः पूर्वदृष्टान्तेन भगवत्तापात्मकं ज्ञानं व्यज्यते द्वितीयेन सेवायोग्यस्वस्वरूपप्राप्तिरूपं ज्ञानं व्यज्यते तृतीयेन बीजभावोत्पत्त्यात्मकज्ञानं व्यज्यते।
Sri Ramanuja
Sanskrit Commentary
+
Sri Ramanuja
Sanskrit Commentary
Listen to this sanskrit commentary
।।3.38।।यथा धूमेन वह्निः आव्रियते यथा च आदर्शो मलेन यथा च उल्बेन आवृतो गर्भः तथा तेन कामेन इदं जन्तुजातम् आवृतम्।आवरणप्रकारम् आह
Sri Shankaracharya
Sanskrit Commentary
+
Sri Shankaracharya
Sanskrit Commentary
Listen to this sanskrit commentary
।।3.38।। धूमेन सहजेन आव्रियते वह्निः प्रकाशात्मकः अप्रकाशात्मकेन यथा वा आदर्शो मलेन च यथा उल्बेन च जरायुणा गर्भवेष्टनेन आवृतः आच्छादितः गर्भः तथा तेन इदम् आवृतम्।।किं पुनस्तत् इदंशब्दवाच्यं यत् कामेनावृतमित्युच्यते
Sri Sridhara Swami
Sanskrit Commentary
+
Sri Sridhara Swami
Sanskrit Commentary
Listen to this sanskrit commentary
।।3.38।। कामस्य वैरित्वं दर्शयति धूमेनेति। यथा धूमेन सहजेन वह्निराव्रियत आच्छाद्यते यथा वाऽऽदर्शो मलेनागन्तुकेन यथा चोल्बेन गर्भवेष्टनचर्मणा गर्भः सर्वतो निरुध्यावृतः तथा प्रकारत्रयेणापि तेन कामेनावृतमिदम्।
Sri Vallabhacharya
Sanskrit Commentary
+
Sri Vallabhacharya
Sanskrit Commentary
Listen to this sanskrit commentary
।।3.38।।कामस्य वैरित्वमाह धूमेनेति। आर्द्रेन्धनसंयोगजोपधिभूतेनैव सहजेन मलेनागन्तुकेन वा उल्बेन सर्वत आच्छादकेन गर्भवेष्टनचर्मणा गर्भ इवावृतं कामेन जगत्।
Vedantadeshikacharya Venkatanatha
Sanskrit Commentary
+
Vedantadeshikacharya Venkatanatha
Sanskrit Commentary
Listen to this sanskrit commentary
।।3.38।।वैरित्वप्रकार उच्यते धूमेनेति। तत्र यथेत्यन्तमेकं वाक्यम्।आदर्शो मलेन च इत्यत्र चकाराद्यथाशब्दोऽनुषक्त इति व्यञ्जनाययथा धूमेनेत्युक्तम्। पूर्वस्मिन् श्लोके क्रोधस्यापि कामावस्थान्तरत्वव्यपदेशादुत्तरत्र चकामरूपेणकामरूपम् 3।43 इति तस्यैवानुवृत्तेरत्रापि तच्छब्देन काम एव परामृश्यत इति व्यञ्जनायतेन कामेनेत्युक्तम्। इदमिति सामान्यनिर्देशेऽप्यचिद्ग्रहणासम्भवात्सर्वक्षेत्रज्ञग्रहणौचित्यादिदंशब्दस्य वक्ष्यमाणपरत्वादपि लोकप्रतीतिपरत्वस्वारस्याच्चयया क्षेत्रज्ञशक्तिः सा वेष्टिता इत्यादिवत् क्षेत्रज्ञानामावरणमिहोच्यत इत्यभिप्रायेणोक्तंइदं जन्तुजातमिति। जन्तुशब्देन शरीरित्वस्य विवक्षितत्वादावरणार्हत्वं दर्शितम्। नपुंसकनिर्देशस्य सामान्यविषयत्वेप्रदर्शनाय जातशब्दः। अनादिवासनानुबन्धित्वेन सहजत्वं निवृत्तस्यापि पुनः पुनरुपाधिवशादागमं स्वेच्छया निवर्तयितुमशक्यत्वं च दर्शयितुं दृष्टान्तत्रयोपादानम्।